उत्तराखंड

कल मनाया जाएगा उत्तराखंड का लोकपर्व फूलदेई..जानिए पूरी कहानी

[tta_listen_btn listen_text="खबर सुनें" pause_text="Pause" resume_text="Resume" replay_text="Replay" start_text="Start" stop_text="Stop"]

देवभूमि उत्तराखंड की लोक संस्कृति धर्म और प्रकृति का अद्भुत संगम है जहाँ वर्ष के सभी महीनों में कोई न कोई  त्यौहार मनाया जाता है उन्हीं त्यौहारों में से एक विशेष त्यौहार है “फूलदेई” जिसे उत्तराखंड के सम्पूर्ण पर्वतांचल में हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। प्रकृति को आभार प्रकट करने वाला लोकपर्व है ‘फूलदेई’…ज्योतिषाचार्य डा.मंजू जोशी बता रहीं हैं इस पर्व की पूरी कहानी..

चैत्र माह की संक्रांति को, जब ऊंची पहाड़ियों से बर्फ पिघल जाती है, सर्दियों के मुश्किल दिन बीत जाते हैं, उत्तराखंड के पहाड़ बुरांश के लाल फूलों की चादर ओढ़ने लगते हैं, तब पूरे इलाके की खुशहाली के लिए फूलदेई का  पर्व मनाया जाता है। सर्दी और गर्मी के बीच का खूबसूरत मौसम, फ्यूंली, बुरांश और बासिंग के पीले, लाल, सफेद फूल और बच्चों के खिले हुए चेहरे..’फूलदेई’ के पर्व की विशेषता है।

नए साल का, नई ऋतुओं का, नए फूलों के आने का संदेश लाने वाला ये पर्व उत्तराखंड के गांवों और कस्बों में मनाया जाता है। ये पर्व मुख्य रूप से किशोरी लड़कियों और छोटे बच्चों का पर्व है। वक्त के साथ तरीके बदले, लेकिन हम सभी को प्रयास करना चाहिए कि अपनी संस्कृति को जिंदा रखें व बढ़ावा दें व लोगों को जागरूक करें।

फूलदेई के दिन लड़कियां और बच्चे सुबह-सुबह उठकर फ्यूंली, बुरांश, बासिंग और कचनार जैसे जंगली फूल इकट्ठा करते हैं। इन फूलों को थाली या टोकरी में सजाया जाता है। टोकरी में फूलों-पत्तों के साथ गुड़, चावल, पैसे और नारियल रखकर बच्चे अपने गांव और मुहल्ले

की ओर निकल जाते हैं फूल और चावलों को गांव के घर की देहरी, यानी मुख्यद्वार पर डालकर लड़कियां उस घर की खुशहाली की कामना करती हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button