Supreme Court ने DGP नियुक्ति नियमों पर केंद्र से मांगा सभी राज्यों का ब्योरा

(फाइल फोटो के साथ) नयी दिल्ली, तीन नवंबर उच्चतम न्यायालय ने पुलिस महानिदेशकों (डीजीपी) की नियुक्ति से जुड़े मामले में अपनी समीक्षा का दायरा मंगलवार को बढ़ाते हुए केंद्र सरकार से कहा कि वह सभी राज्यों में पुलिस प्रमुखों के चयन एवं नियुक्ति के लिए लागू कानूनों, नियमों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं का सार उपलब्ध कराए। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की खंडपीठ ने झारखंड सरकार एवं राज्य की पुलिस महानिदेशक तदाशा मिश्रा को भी 16 नवंबर तक जवाब दाखिल करने को कहा। मिश्रा को उनकी सेवानिवृत्ति से एक दिन पहले पुलिस प्रमुख नियुक्त किया गया था।
केंद्र और अन्य ने उनकी नियुक्ति को चुनौती देते हुए याचिका दायर की है। प्रधान न्यायाधीश ने मामले में न्याय मित्र के रूप में पीठ की सहायता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन की दलीलों से सहमति जताते हुए कहा, ‘‘मुझे लगता है कि राजू सही कह रहे हैं कि केंद्र सरकार हमें डीजीपी की नियुक्ति के संबंध में प्रत्येक राज्य में लागू कानूनों, नियमों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं का सार उपलब्ध करा सकती है।’’ रामचंद्रन ने उच्चतम न्यायालय से अनुरोध किया कि वह केंद्र और राज्य सरकारों को यह बताने का निर्देश दे कि क्या उन्होंने डीजीपी की नियुक्ति के लिए कोई कानून बनाया है या नियम निर्धारित किए हैं और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या इन प्रावधानों का पालन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि कुछ राज्यों ने झारखंड की तरह ही नियम बनाए हैं, लेकिन वे अब भी दावा कर रहे हैं कि वे उच्चतम न्यायालय के प्रकाश सिंह मामले में दिए गए निर्देशों का पालन कर रहे हैं।
उन्होंने विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और पंजाब का उल्लेख किया, जहां इसी तरह के प्रावधान होने की बात कही गई है। रामचंद्रन ने कहा कि इस मुद्दे की समग्र समीक्षा करने के लिए विभिन्न राज्यों में लागू कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्थाओं का व्यापक आकलन जरूरी है, ताकि न्यायालय केवल अलग-अलग राज्यों के नियमों की वैधता पर विचार करने तक सीमित न रहे। खंडपीठ ने संकेत दिया कि राज्यों को भी अपने जवाब दाखिल करने होंगे।
उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि संबंधित प्रावधान कानूनों, विनियमों या प्रशासनिक आदेशों के रूप में हो सकते हैं, लेकिन उनके कानूनी प्रभाव की न्यायिक समीक्षा की जाएगी। खंडपीठ ने न्याय मित्र को इस संबंध में एक विस्तृत नोट रिकॉर्ड में पेश करने को कहा। उसने रजिस्ट्री को यह नोट स्वीकार करने और इसकी प्रतियां संबंधित पक्षों के वकीलों को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
शीर्ष अदालत ने झारखंड की डीजीपी को 16 नवंबर, 2026 तक जवाबी हलफनामा दाखिल करने का मौका भी दिया। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि झारखंड से जुड़े मामले की सुनवाई पहले की जानी चाहिए, क्योंकि राज्य के नियम डीजीपी की नियुक्ति प्रक्रिया के संबंध में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के विपरीत पाए गए हैं। खंडपीठ ने झारखंड सरकार के पुलिस प्रमुख की नियुक्ति से संबंधित नियमों की वैधता पर आठ अक्टूबर को सवाल उठाए थे और कहा था कि संबंधित प्रावधान प्रकाश सिंह मामले में दिए गए फैसले में निर्धारित कानूनी सिद्धांतों के प्रथम दृष्टया विपरीत प्रतीत होता है।
खंडपीठ ने यह भी कहा था कि यदि अंततः इस नियम को रद्द कर दिया जाता है तो इसके आधार पर की गई मौजूदा डीजीपी की नियुक्ति भी रद्द की जा सकती है। झारखंड की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने न्यायालय को बताया कि उन्होंने मुख्य सचिव से बात की है और राज्य सरकार इस मुद्दे पर विचार करके न्यायालय में उचित आवेदन या हलफनामा दाखिल करेगी। केंद्र ने झारखंड सरकार के ‘पुलिस महानिदेशक एवं पुलिस महानिरीक्षक, झारखंड (पुलिस बल के प्रमुख) चयन और नियुक्ति संबंधी विनियम, 2025’ को चुनौती दी है।



