पहलगाम हमले पर सख्त रुख से लेकर Iran-UAE की ऐतिहासिक सुलह तक, जानें ब्रिक्स समिट में कैसे चमका भारत का दबदबा
18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि क्या दो सक्रिय युद्धों (यूक्रेन संकट और मध्य पूर्व तनाव) और सदस्य देशों के बीच गहराते मतभेदों के बावजूद एक सर्वसम्मत दृष्टिकोण बनाया जा सकता है। इसके अलावा, नई दिल्ली के सामने यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी थी कि चीन और रूस की मौजूदगी के बावजूद ब्रिक्स (BRICS) को किसी स्पष्ट ‘अमेरिका-विरोधी’ मंच में न तब्दील होने दिया जाए। तमाम आशंकाओं को दरकिनार करते हुए 12 सितंबर को सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ को अपना लिया। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रोफेसर जेफरी सैक्स ने इसे भारत की एक बड़ी संस्थागत सफलता करार देते हुए कहा कि नई दिल्ली ने अत्यंत चुनौतीपूर्ण समय में भी आम सहमति बनाकर अपनी कूटनीतिक क्षमता का लोहा मनवाया है।
अर्थशास्त्री और कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जेफरी सैक्स ने समिट को सफल बताते हुए कहा कि घोषणापत्र से पता चलता है कि “ब्रिक्स देश वैश्विक मंच पर अपनी जगह बना रहे हैं”। भारत की G20 अध्यक्षता से इसकी तुलना करते हुए सैक्स ने कहा कि नई दिल्ली “बहुत मुश्किल समय में भी” आम सहमति बनाने में सफल रही। खास बात यह है कि तीन दिनों में – समिट से पहले की शाम और समिट के दो दिनों के दौरान – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेशी नेताओं के साथ 15 औपचारिक द्विपक्षीय बैठकें कीं।
नई दिल्ली के लिए कूटनीतिक परीक्षा यह थी कि वह दो सक्रिय युद्धों, देशों के बीच व्यापारिक तनाव और भू-राजनीतिक विभाजनों के बीच इस विविध समूह को कैसे आगे बढ़ाती है, ताकि इन मतभेदों से समूह के काम में कोई रुकावट न आए। इस मामले में, दिल्ली समिट ने भारत को पांच बड़ी जीत दिलाईं। आइए उन पर एक नज़र डालते हैं।
1. नई दिल्ली ईरान-UAE बैठक का मंच बना
समिट के सामने सबसे बड़ी और तत्काल चुनौती मध्य पूर्व में चल रहा युद्ध था। मिडिल ईस्ट में चल रहे टकराव को लेकर ईरान और UAE के विचार ब्रिक्स (BRICS) में बिल्कुल अलग-अलग थे। फरवरी के आखिर में जब US-इजरायल-ईरान के बीच तनाव शुरू हुआ, तब ईरान ने UAE में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले किए। ये दोनों देश इस ग्रुप के अंदर मतभेद का एक बड़ा कारण बन गए थे। मई में नई दिल्ली में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक बिना किसी साझा बयान के खत्म हो गई, क्योंकि मिडिल ईस्ट के मुद्दों पर आम सहमति नहीं बन पाई थी। ईरान चाहता था कि US-इजरायल युद्ध पर कड़ा रुख अपनाया जाए, जबकि UAE ने उन बातों पर आपत्ति जताई जिन्हें वह स्वीकार नहीं कर सकता था।
इस वजह से सितंबर में नेताओं के साझा घोषणापत्र (डिक्लेरेशन) पर सहमति बनने की उम्मीद कम थी। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में स्टडीज़ और फॉरेन पॉलिसी के वाइस प्रेसिडेंट हर्ष वी. पंत ने समिट से पहले ही चेतावनी दी थी कि ईरान-UAE के बीच तनाव के कारण फिर से साझा घोषणापत्र जारी नहीं हो पाएगा। बड़ी कामयाबी न सिर्फ घोषणापत्र में, बल्कि कूटनीतिक माहौल में भी साफ दिखी। ईरान और UAE, दोनों ने ब्रिक्स के उस बयान पर सहमति जताई जिसमें मिडिल ईस्ट में संयम बरतने की अपील की गई थी। इसके बाद, ब्रिक्स समिट के दौरान ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाहयान से मुलाकात की। रॉयटर्स के मुताबिक, टकराव शुरू होने के बाद से दोनों देशों के बीच यह सबसे ऊंचे स्तर की बैठक थी। इसलिए, भारत की कूटनीतिक जीत यह थी कि उसने ईरान और UAE के बीच के मतभेद को पूरे ब्रिक्स ग्रुप के मतभेद में बदलने से रोका और नई दिल्ली को ईरान-UAE की बैठक का मंच बनाया।
2. भारत ने आम सहमति फिर से कायम की, जो ब्रिक्स के लिए एक संस्थागत जीत थी
दूसरी और शायद ज़्यादा अहम उपलब्धि संस्थागत स्तर पर थी। ब्रिक्स पहले ही यह दिखा चुका था कि विस्तार के कारण आम सहमति बनाना मुश्किल हो गया है। अप्रैल 2025 में रियो डी जनेरियो में हुई विदेश मंत्रियों की बैठक में कोई साझा बयान जारी नहीं हो पाया था। उस समय ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहे ब्राज़ील ने इसके बजाय ‘चेयर का बयान’ (अध्यक्ष का बयान) जारी किया था। इसलिए, दिल्ली समिट के सामने विश्वसनीयता का सवाल खड़ा था। क्या वह काम दिल्ली समिट में हो सकता था जो 2025 और 2026 की शुरुआत में नहीं हो पाया था? हाँ, ऐसा हुआ।
नई दिल्ली घोषणापत्र में न केवल भू-राजनीतिक मुद्दों पर आम सहमति बनी, बल्कि इसमें कई तरह के संस्थागत और आर्थिक वादे भी शामिल थे। इसमें वैश्विक शासन में सुधार, विकास के लिए वित्त, व्यापार, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सप्लाई चेन और सहयोग के अन्य क्षेत्रों पर काम जारी रखने का समर्थन किया गया। घोषणापत्र में भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता की भी खुलकर तारीफ की गई और शिखर सम्मेलन की मेजबानी के लिए नई दिल्ली का धन्यवाद किया गया।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आम सहमति से काम करने वाले समूह के लिए शिखर सम्मेलन का घोषणापत्र केवल एक औपचारिक दस्तावेज नहीं होता। इसे अपनाना यह दिखाता है कि संस्था को अप्रासंगिक बनाए बिना भी मतभेदों को संभाला जा सकता है। विदेश नीति के विशेषज्ञ हर्ष वी. पंत ने शिखर सम्मेलन से पहले इसे एक बड़ी परीक्षा बताया था। उन्होंने कहा था कि ब्रिक्स की विश्वसनीयता दांव पर है क्योंकि “कई देश ब्रिक्स को उम्मीद की नजर से देख रहे हैं”। उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर संयुक्त बयान जारी नहीं हो पाया, तो यह उम्मीद खत्म हो सकती है। इसलिए, भारत की उपलब्धि ने यह दिखाया कि आपसी मतभेदों वाले समूह के बावजूद एक साझा दस्तावेज तैयार किया जा सकता है।
3. पहलगाम हमले की निंदा से भारत को बड़ी कूटनीतिक जीत मिली
भारत के लिए एक और महत्वपूर्ण नतीजा 22 अप्रैल, 2025 के पहलगाम आतंकी हमले का स्पष्ट उल्लेख था। नई दिल्ली घोषणापत्र में कहा गया है कि ब्रिक्स सदस्य जम्मू-कश्मीर में हुए आतंकी हमले की “कड़े से कड़े शब्दों में निंदा” करते हैं, जिसमें 26 लोग मारे गए और कई अन्य घायल हुए। यह आतंकवाद से निपटने के लिए समूह की प्रतिबद्धता को दोहराता है, जिसमें आतंकवादियों की सीमा-पार आवाजाही, आतंकी फंडिंग और सुरक्षित पनाहगाह शामिल हैं। यह आतंकवाद के प्रति “जीरो टॉलरेंस” (सख्त रुख) की भी मांग करता है और आतंकवाद-रोधी मामलों में दोहरे मापदंडों को खारिज करता है। चीन, इंडो-पैसिफिक और ताइवान मामलों की विशेषज्ञ सना हाशमी ने X पर एक पोस्ट में इस बात पर जोर दिया। घोषणापत्र में पाकिस्तान का नाम नहीं लिया गया है। लेकिन इसमें खास तौर पर पहलगाम हमले का जिक्र है और सामूहिक रूप से इसे आतंकी हमला बताकर इसकी निंदा की गई है। इसमें यह भी कहा गया है कि “आतंकी गतिविधियों में शामिल सभी लोगों और उनके समर्थकों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए और संबंधित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुसार उन्हें सजा दिलाई जानी चाहिए”।



