TMC MP Abhishek Banerjee को बड़ी राहत, Calcutta High Court का आदेश- 6 अगस्त तक No Coercive Action

कलकत्ता हाई कोर्ट ने गुरुवार को पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद अभिषेक बनर्जी के खिलाफ दर्ज तीन FIR के मामले में 6 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई तक उनके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई न करें। इस मामले की सुनवाई जस्टिस सौगत भट्टाचार्य की सिंगल बेंच ने की। बेंच ने भवानीपुर पुलिस स्टेशन (केस नंबर 121), कालीतला पुलिस स्टेशन (केस नंबर 140) और बिष्णुपुर पुलिस स्टेशन (केस नंबर 668) में दर्ज FIR के संबंध में अंतरिम निर्देश जारी किया। कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि वे अभिषेक बनर्जी के खिलाफ अब तक दर्ज सभी FIR की जानकारी वाली एक लिस्ट उपलब्ध कराएं।
सुनवाई के दौरान, राज्य की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने तर्क दिया कि याचिका सुनवाई योग्य नहीं है और याचिकाकर्ता को पूरी सुरक्षा (ब्लैंकेट प्रोटेक्शन) नहीं दी जा सकती। राजू ने कहा कि इस तरह की पूरी सुरक्षा नहीं दी जा सकती। आपको कई FIR के लिए अलग-अलग याचिकाएँ दायर करनी होंगी। अभिषेक बनर्जी की ओर से पेश वकील शंकर नारायण ने तर्क दिया कि उनके क्लाइंट के खिलाफ कई शिकायतें और FIR दर्ज की गई थीं, जिनमें से कुछ चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद दर्ज की गईं। उन्होंने बताया कि कई शिकायतें उन लोगों ने दर्ज कराई थीं जिन्होंने पहले अभिषेक बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ा था और आरोप लगाया कि कुछ मामले कई साल पहले हुई घटनाओं से जुड़े थे।
वकील ने ‘सेबाश्रॉय’ (Sebashroy) के नाम पर फंड के कथित गबन से जुड़े एक मामले का भी ज़िक्र किया और कहा कि यह प्रोजेक्ट अभिषेक बनर्जी ने डायमंड हार्बर में बुजुर्गों के लिए अपनी निजी हैसियत से शुरू किया था और इसमें सरकारी फंड का इस्तेमाल नहीं हुआ था। सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने कुछ शिकायतें दर्ज करने में हुई देरी पर सवाल उठाए। एक शिकायत का ज़िक्र करते हुए, जस्टिस भट्टाचार्य ने पूछा कि कथित घटना और शिकायत के बीच 25 दिनों का अंतर क्यों था।
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि शिकायत करने वालों में से एक ने कथित तौर पर अभिषेक बनर्जी के खिलाफ दो बार चुनाव लड़ा था और दोनों बार हार गए थे।
हालांकि, राज्य ने सुरक्षा की याचिका का विरोध किया। SV राजू ने तर्क दिया कि जिन मामलों में केवल शिकायतें दर्ज की गई हैं और कोई FIR दर्ज नहीं की गई है, उनमें कानून के तहत कार्यवाही रद्द करने की मांग नहीं की जा सकती। उन्होंने यह भी कहा कि अगर याचिकाकर्ता किसी FIR से राहत चाहता है, तो सही तरीका धारा 438 के तहत कोर्ट का दरवाजा खटखटाना है।



