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France Protest: कितना लुट गया फ्रांस, आंकड़े जान दिमाग घूम जाएगा!

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क्या फ्रांस में विरोध प्रदर्शन के नाम पर लग्जरी लूट का खेल चल रहा है? हंगाई के खिलाफ आंदोलन करने निकले छात्र लेकिन निशाने पर आ गए करोड़ों के लग्जरी ब्रांड। एक  तरफ ट्रंप प्रवासियों को जिम्मेदार इसका बता रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ फ्रांस के युवा शिक्षा, रोजगार और अपने भविष्य के लिए सड़कों पर हैं। दरअसल 19 अक्टूबर 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्रुथ सोशल पर लिखा द माइग्रेंट्स हैव टेकन ओवर फ्रांस दे मस्ट क्लोज द बॉर्डर्स फास्ट प्रेसिडेंट ने यह पोस्ट किया यानी ट्रंप का दावा है कि प्रवासियों ने फ्रांस पर कब्जा कर लिया है और देश को तुरंत अपनी सीमाएं बंद कर देनी चाहिए। दरअसल फ्रांस में स्कूलों की बदहाली, बढ़ती महंगाई और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर शुरू हुआ प्रदर्शन। व्यापक हिंसा और राजनीतिक संकट में बदल गया है। 17 अक्टूबर के प्रदर्शनों के दौरान कई शहरों में दुकानों में लूटपाट, आगजनी और पुलिस के साथ झड़पें हुई।
फ्रांस के गृह मंत्रालय के मुताबिक करीब 2400 लोगों को गिरफ्तार किया गया। प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने हिंसा प्रभावित इलाकों में स्थानीय कर्फ्यू लगाने के निर्देश दिए। लेकिन यहां एक जरूरी बात समझने की है। प्रदर्शनों की रिपोर्ट्स में शिक्षा, महंगाई और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी शिकायतें प्रमुख कारण है। ट्रंप ने इन घटनाओं को इमीग्रेशन से जोड़ा है। लेकिन उनकी पोस्ट अपने आप में इस दावे का सबूत नहीं है कि प्रवासी ही हिंसा की वजह है। स्कूलों से शुरू हुआ आंदोलन पूरे देश में कैसे फैला? इस कहानी की शुरुआत सितंबर 2026 में पेरिस के कुछ सरकारी स्कूलों से हुई। छात्रों ने शिकायत की कि स्कूलों में शिक्षकों की कमी है। क्लासरूम में जरूरत से ज्यादा बच्चे हैं और कई जगह बुनियादी सुविधाएं तक नहीं है। छात्रों का सवाल है कि जब स्कूलों में पढ़ाई का माहौल ही ठीक नहीं होगा तो उनका भविष्य कैसे बनेगा?

धीरे-धीरे यह विरोध पेरिस से निकलकर लन, लिली, बोडो, नाथ और मारसेई जैसे शहरों तक फैल गया। 17 अक्टूबर को देशव्यापी प्रदर्शन में फ्रांस के गृह मंत्रालय के मुताबिक लगभग 5 लाख लोग शामिल हुए। आयोजकों ने इससे अधिक संख्या का दावा किया है। छात्रों के साथ सरकारी कर्मचारी, ट्रेड यूनियन और पहले के आंदोलनों से जुड़े लोग भी सड़कों पर उतरे। यानी एक छात्र आंदोलन ने समाज के दूसरे वर्गों की नाराजगी को भी सामने लाकर रख दिया।  जेनजी की लड़ाई सिर्फ पढ़ाई की नहीं है। फ्रांस के युवाओं के सामने कई सवाल हैं। पहला सवाल है शिक्षा का। स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक और सुविधाएं नहीं होंगी तो गरीब और अमीर परिवारों के बच्चों के बीच अवसरों का अंतर कैसे कम होगा? दूसरा सवाल महंगाई का है। रोजमर्रा की जरूरतों पर खर्च बढ़ने से परिवारों पर दबाव है। युवाओं को भी पढ़ाई के बाद आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की चिंता है। तीसरा सवाल सरकारी सेवाओं का है। प्रदर्शनकारियों को डर है कि बजट में कटौती से शिक्षा और दूसरी सार्वजनिक सुविधाएं कमजोर हो सकती हैं। चौथा सवाल है राजनीतिक व्यवस्था का। युवाओं के बीच यह भावना दिखाई दे रही है कि उनकी समस्याओं को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिल रही। हालांकि फ्रांस की पूरी जेंजी को एक ही विचारधारा या एक ही मांग से जोड़ना सही नहीं होगा। कुछ युवा शिक्षा के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। कुछ आर्थिक असमानता के खिलाफ हैं और कुछ दूसरे सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय हैं। सरकार के 54 अरब यूरो बचाने के प्लान पर गुस्सा छात्रों में आखिर क्यों है?

दरअसल फ्रांस की सरकार के प्रस्तावित 2027 के बजट में लगभग 54 अरब यूरो के खर्च में कटौती और कर संबंधी उपाय शामिल हैं। सरकार का तर्क है कि देश के बजट घाटे को कम करने के लिए यह जरूरी है। लेकिन प्रदर्शनकारियों को आशंका है कि इसकी कीमत आम लोगों को चुकानी पड़ेगी। सरकारी कर्मचारियों के वेतन मान को स्थिर रखने के प्रस्ताव पर भी ट्रेड यूनियन ने नाराजगी जताई है। अगर जेसी के नजरिए से देखिए शिक्षा की सुविधाएं कम हो, रोजगार को लेकर अनिश्चितता बनी रहे और परिवार आर्थिक दबाव में हो तो युवाओं में असंतोष बढ़ना लाजमी है। यही वजह है कि स्कूलों से शुरू हुआ आंदोलन अब आर्थिक असमानता और सरकारी नीतियों के खिलाफ व्यापक विरोध बन गया है।

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