अन्तर्राष्ट्रीय

चीन को पटखनी देने का सुनहरा अवसर

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चीन हर अवसर पर भारत को घेरने की फिराक में रहता है। ‘हिंदी-चीनी भाई- भाई’ का नारा देकर भारत की पीठ में छूरा घोपने वाला चीन अब भारत को हाथी और ड्रैगन बताकर दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा है। इस स्लोगन के साथ वह पूरी दुनिया को बताना चाहता है कि उसके संबंध भारत से अच्छे हैं और भविष्य में और मजबूत होंगे, लेकिन ऐसा नहीं है।

चीन दोस्ती की बात तो कर रहा है, लेकिन पड़ोसी देशों में अपनी गतिविधियों को बढ़ाकर वह भारत को सामरिक दृष्ट से मात देने की कोशिश भी कर रहा है। ऐसे में भारत के लिए एक मौका आया है, पड़ोसी देश श्रीलंका से। उम्मीद है भारत इस मौके को हाथ से नहीं जाने देगा, हालांकि भारत की अध्यक्षता में हुई क्वाड की बैठक में चीन को घेरने की रणनीति बनी है। इससे चीन भी परेशान है।

श्रीलंका को चीन ने कर्ज के जाल में फंसाकर उसके हंबनटोटा बंदरगाह को 99 साल की लीज पर ले लिया है। इससे हिंद महासागर में उसकी पकड़ मजबूत हुई है। पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट पर चीन का नियंत्रण है, क्योंकि यह पोर्ट चीन- पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का हिस्सा है। इसी तरह चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे का प्रमुख हिस्सा म्यांमार का क्योक्प्यू बंदरगाह भी चीन के नियंत्रण में है। चीन ने यहां बड़े पैमाने पर निवेश कर रखा है। यह प्रोजेक्ट चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत म्यांमार के रखाइन राज्य में स्थापित की जा रही है।

चीन का प्रभाव बांग्लादेश में भी बढ़ रहा है। चीन ने बांग्लादेश के चटगांव बंदरगाह पर निवेश किया है। इस बंदरगाह के साथ ही उसने भारत के चिकननेक के करीब स्थित मोंगला बंदरगाह को भी विकसित करने का लक्ष्य रखा है। चीन की भारत के पड़ोसी देशों में बढ़ती गतिविधियां ठीक नहीं हैं, क्योंकि चीन इस तरह हमारे ऊपर सामरिक दृष्टि से बढ़त बनाना चाहता है, हालांकि भारत ने भी उसे उसी की भाषा में जवाब देने की तैयारी शुरू की है।

अब भारत के पास अवसर है कि वह श्रीलंका के मट्टाला राजपक्षे अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे को लीज पर ले। श्रीलंका सरकार ने इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू निवेशकों से एक्सप्रेशन ऑफ इंट्रेस्ट आमंत्रित किया है। भारत इस हवाई अड्डे पर नियंत्रण करता है, तो आसानी से वह हंबनटोटा बंदरगाह पर चीन की हर गतिविधि पर आसानी से नजर रख सकेगा। इससे चीन भी दबाव में रहेगा।

साथ ही भारत को वह गलती भी सुधारने का मौका मिल जाएगा, जो उसने हंबनटोटा को लीज पर न लेकर किया था। तब श्रीलंका ने सबसे पहले भारत से ही आग्रह किया था कि वह इस बंदरगाह को लीज पर ले, लेकिन भारत सरकार ने इसे घाटे का सौदा मानते हुए मना कर दिया था, लेकिन भारत को घेरने का कोई भी मौका हाथ से न जाने देने की नीति पर चल रहे चीन ने तत्काल इसे लपक लिया था।

चीन इस बंदरगाह का उपयोग जासूसी जहाजों और सैन्य अड्डे के रूप में प्रयोग कर सकता है, इस बात का खतरा हमेशा बना रहता है। इस खतरे को कम करने के लिए ही भारत के पास मौका है कि वह इसके बगल में स्थित एयरपोर्ट को लीज पर ले। यह सही है कि यह दुनिया का सबसे खाली एयरपोर्ट माना जाता है। यहां आर्थिक रूप से भारत को कोई लाभ नहीं मिलेगा, लेकिन सामरिक रूप से मजबूती हो जाएगी। वैसे तो भारत ने भी चीन को उसी की भाषा में जवाब देना शुरू किया है। फिलीपींस को भारत ने ब्रह्मोस मिसाइलों की आपूर्ति शुरू कर दी है। वियतनाम भी भारत से इस मिसाइल की खरीद को आतुर दिख रहा है।

इसके साथ ही भारत ने जापान, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों के साथ भी रक्षा और समुद्री सहयोग को गति देना शुरू किया है। भारत ने इसके साथ ही फ्रांस और जापान के साथ लॉजिस्टिक व तटीय निगरानी नेटवर्क से जुड़ा समझौता किया है।  सेशेल्स में नौसैनिक अड्डों की व्यवस्था भी कर ली है। इससे चीन सकते में आ गया है। अब चीन को भी यह बात समझ आने लगी है कि भारत उसकी हर चाल का जवाब देने को तैयार है। ऐसे में चीन फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। भारत ने हाल ही में अमेरिका से अपाचे हेलीकॉप्टरों के लिए जरूरी सेवाओं और उससे जुड़े उपकरण की खरीद का समझौता किया है।

भारत दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया आदि देशों के साथ भी अपने सामरिक रिश्तों को मजबूत किया है। इससे चीन बेचैन है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तानी सेना को तकनीकी मदद देने वाले चीन के थिंकटैंक को अब यह समझ में आ गया है कि भारत उसे हर मोर्चे पर मात देने के लिए जो भी जरूरी कदम है उसे उठाएगा। चीन तब से कुछ अधिक ही बेचैन है, जब से पाकिस्तान को तकनीकी मदद देने संबंधी रिपोर्ट लीक हुई, हालांकि भारत पहले से ही कहता रहा है कि चीन ने पाकिस्तान को मदद दी। बार-बार जापान से उलझने की कोशिश कर रहे चीन को पता है कि उसकी चाल को नाकाम करने के लिए भारत, जापान के साथ खड़ा हो सकता है।

इतना ही नहीं भारत लगातार उन्नत श्रेणी की मिसाइलों, ड्रोन, रडार सिस्टम आदि का परीक्षण कर अपनी रक्षा शक्ति में इजाफा भी कर रहा है। इससे भी चीन परेशान है। पाकिस्तान का समर्थन कर रहे चीन को ताइवान के मुद्दे पर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर घेरे और अफगानिस्तान में भी अपनी सामरिक स्थिति को मजबूत करे। चीन ने हाल ही में कश्मीर के मुद्दे पर फिर सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान का समर्थन किया, लेकिन क्वाड की मीटिंग में जैसे ही एकजुटता का संदेश दिया गया, चीन न सिर्फ चिढ़ गया, बल्कि उसे यह बयान भी देना पड़ा कि यह बैठक उसे घेरने के लिए की गई।

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