‘हमारे पास Drone रोकने तक के हथियार नहीं हैं’, US Deputy Commander Joseph Jarrard के खुलासे से Russia, China, North Korea और Iran मुस्कुराए

ऐसे में जबकि ईरान अपनी जीत और अमेरिका की हार का खुला ऐलान कर रहा है, तब अमेरिकी जनरल की ओर से किया गया खुलासा बड़ा चौंकाने वाला है और डोनाल्ड ट्रंप के दावों पर भी यह एक तरह से बड़ा सवाल है। हम आपको बता दें कि नॉर्दर्न कमांड के डिप्टी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जोसेफ जारार्ड ने साफ कहा है कि अमेरिका के पास पर्याप्त सेंसर और ड्रोन रोधी हथियार नहीं हैं। मामला यहीं खत्म नहीं होता। ईरान युद्ध ने अमेरिका के महंगे मिसाइल रोधी भंडार को भी बुरी तरह झकझोर दिया है। यानी जिस अमेरिका को दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य मशीन माना जाता है, वह एक ऐसे युद्ध के बीच खड़ा है जहां उसे एक तरफ सस्ते ड्रोन और मिसाइलों की बड़ी संख्या रोकनी पड़ रही है और दूसरी तरफ अपने तेजी से घटते, बेहद महंगे इंटरसेप्टर और प्रिसीजन हथियारों के भंडार को फिर से भरने की चिंता सता रही है।
हम आपको बता दें कि अमेरिकी नॉर्दर्न कमांड के डिप्टी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जोसेफ जारार्ड ने अलबामा में Space and Missile Defense Symposium में कहा कि अमेरिका के पास पर्याप्त सेंसर और ऐसे हथियार यानी ‘इफेक्टर्स’ ही नहीं हैं, जिनसे बड़े पैमाने पर आने वाले ड्रोन झुंड का मुकाबला किया जा सके। उनका निष्कर्ष बेहद गंभीर था कि अमेरिका फिलहाल इस तरह के हमले से निपटने के लिए “बुरी तरह अपर्याप्त” स्थिति में है।
सबसे बड़ी समस्या डिटेक्शन की है। अमेरिकी सेना के पास हर संभावित इलाके में ड्रोन को पहचानने और ट्रैक करने के लिए पर्याप्त सेंसर नहीं हैं। यानी हमला होने के बाद जवाबी कार्रवाई की बात तो दूर, कई परिस्थितियों में खतरे का समय रहते पता लगाना ही मुश्किल हो सकता है। जारार्ड ने साफ किया कि NORAD फिलहाल अपने मौजूदा रडार नेटवर्क पर निर्भर है और स्थानीय पुलिस तथा अन्य एजेंसियों के सेंसर और प्रणालियों से तालमेल बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
यही इस संकट का सामरिक केंद्र है। देखा जाये तो आधुनिक ड्रोन युद्ध में महंगे फाइटर जेट, मिसाइल या इंटरसेप्टर हर सस्ते ड्रोन को नष्ट करने का व्यावहारिक समाधान नहीं हैं। यदि दुश्मन कुछ हजार डॉलर के ड्रोन के सामने लाखों डॉलर का इंटरसेप्टर इस्तेमाल करवाता है, तो वह अमेरिका को आर्थिक और सैन्य दोनों स्तरों पर थका सकता है। ईरान युद्ध में यह असंतुलन अमेरिकी रणनीतिकारों के सामने वास्तविक युद्धक्षेत्र की चुनौती बनकर उभरा है।
इसके साथ ही इस प्रकार के भी तथ्य उभर कर आ रहे हैं कि ईरान के खिलाफ 39 दिन चले अभियान और उसके बाद की लड़ाई ने सात प्रमुख अमेरिकी म्यूनिशन श्रेणियों को खास तौर पर प्रभावित किया है। युद्ध से पहले अमेरिका के पास अनुमानतः करीब 3100 Tomahawk क्रूज मिसाइल थीं, जिनमें 1000 से अधिक इस्तेमाल हुईं; लगभग 4400 JASSM में से 1100 से ज्यादा खर्च हुईं। साथ ही अमेरिका के पास उपलब्ध करीब 90 PrSM में से अनुमानतः 40–70 इस्तेमाल हो गए; लगभग 410 SM-3 में से 130–250 दागे गए; 1160 SM-6 में से 190–370 खर्च हुए; करीब 360 THAAD इंटरसेप्टर में से 190–290 इस्तेमाल हुए और लगभग 2330 Patriot इंटरसेप्टरों में से 1060–1430 खर्च होने का अनुमान है। यानी सबसे ज्यादा चोट उस अमेरिकी क्षमता पर पड़ी है जो दुश्मन की मिसाइलों को रोकती है।
यह संकट इसलिए और गंभीर है क्योंकि भंडार घटने और उत्पादन क्षमता के बीच भारी अंतर है। रिपोर्टों के अनुसार, वाशिंगटन ने अगस्त में Patriot और THAAD के पुर्जों का उत्पादन तेज करने के लिए 3 अरब डॉलर से ज्यादा का समझौता किया है; लक्ष्य Patriot उत्पादन को तीन गुना और THAAD को चार गुना करना है। इसी तरह Tomahawk उत्पादन को मौजूदा लगभग 60 प्रति वर्ष से बढ़ाकर अंततः 1000 प्रति वर्ष करने की योजना है। SM-3 के Block IB और Block IIA इंटरसेप्टरों के घटकों का उत्पादन बढ़ाने के लिए भी 14 अगस्त को Boeing और RTX के साथ नए समझौते किए गए। लेकिन असली झटका यह है कि नई खेपों से इन भंडारों को भरने में कई साल लग सकते हैं। अमेरिकी हथियारों के भंडार की ताजा स्थिति को देखें तो कहा जा सकता है कि ईरान युद्ध ने अमेरिका को “हथियार-विहीन” तो नहीं किया है, लेकिन उसने उसकी magazine depth यानी लंबे और एक साथ चलने वाले युद्ध को जारी रखने की क्षमता को बुरी तरह प्रभावित किया है। यही वह बिंदु है जहां ईरान की रणनीति का महत्व सामने आता है। दरअसल तेहरान अपेक्षाकृत सस्ते ड्रोन और मिसाइलों की बड़ी संख्या से अमेरिका को अत्यंत महंगे इंटरसेप्टर खर्च करने पर मजबूर कर रहा है।
इसीलिए पेंटागन अब रिकॉर्ड 21 अरब डॉलर के स्तर पर ड्रोन-रोधी क्षमताओं, गोला-बारूद और संबंधित अत्याधुनिक प्रणालियों के लिए धन मांग रहा है। Joint Interagency Task Force 401 को घरेलू सैन्य ठिकानों के आसपास ड्रोन खतरे से निपटने के लिए अधिक अधिकार दिए गए हैं। सैकड़ों मिलियन डॉलर की फंडिंग काउंटर-UAS तकनीक पर लगाई जा चुकी है, जबकि अमेरिकी सेना ने ऐसा बाजार भी विकसित किया है जहां सेना, कानून-प्रवर्तन एजेंसियां और कुछ विदेशी सैन्य संगठन ड्रोन-रोधी प्रणालियां हासिल कर सकते हैं।
लेकिन समस्या सिर्फ पैसे की नहीं बल्कि समन्वय की भी है। टेक्सास में इस साल नए एंटी-ड्रोन लेजर के इस्तेमाल के दौरान संघीय एजेंसियों के बीच तालमेल की विफलता ने एयरस्पेस तक अस्थायी रूप से बंद करा दिया। यानी जिस देश के पास दुनिया की सबसे उन्नत सैन्य तकनीक है, उसकी अलग-अलग एजेंसियां अभी भी इन प्रणालियों को एकीकृत तरीके से चलाने की चुनौती से जूझ रही हैं।
साथ ही अमेरिका अब यूक्रेन के अनुभव से भी सीख रहा है। यूक्रेन के ‘ऑपरेशन स्पाइडरवेब’ ने यह दिखा दिया कि व्यावसायिक रूप से उपलब्ध छोटे ड्रोन भी किसी देश की गहराई में घुसकर अत्यधिक मूल्यवान सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकते हैं। रूस के भीतर ट्रकों के जरिए ड्रोन पहुंचाकर उसके एयरफील्ड पर खड़े बमवर्षकों को निशाना बनाया जाना अमेरिकी रणनीतिकारों के लिए चेतावनी है कि भौगोलिक दूरी अब सुरक्षा की गारंटी नहीं है।


